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Thursday, 11 March 2010
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म
इस के लेख़क हैं Shashi Yadav   

हिंदू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी सेवा माना गया है । शास्त्र-मातृ देवो भव, पित्र देवो भव आदि सम्मानित वचनों से देवताओं के समान पूजनीय मानते हैं । माता का स्थान तो पिता से

अधिक माना गया है- जननी और जन्म-भूमि को तो स्वर्ग से भी श्रेष्ठ कहा गया है ।
      प्रत्यक्ष में माता और पिता के द्वारा ही संतान के शरीर का निर्माण होता है। अतः शरीर देने वाले सबसे पहले देवता माता-पिता ही है । माता संतान का पालन-पोषण करने के लिए नौ-दस तक कष्ट

सहती है और अपने विचारों से संस्कार-संपन्न संतान को जन्म देती है, इसीलिए माता-पिता संसार में सर्वाधिक पूजनीय है ।
   माता-पिता की इस सेवा के लिए ही हिंदू धर्म में पितृ-ऋण की व्यवस्था है। इस ऋण को चुकाए बिना अथवा माता की अनुमति के बिना पुत्र को गृहस्थ जीवन से विमुख होने की आज्ञा नही हैं।
संन्यास ग्रहण करने के लिए भी इस ऋण से मुक्त होना आवश्यक है।
  ज्ञान पाने की दृष्टि से यद्यपि गुरू का बडा महत्व है,लेकिन माता को बच्चे की पहली गुरू कहकर सम्मानित किया गया है। मनुस्मृति में स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि-
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥
अर्थात्‌ उपाध्यायों सें दस गुना श्रेष्ठ आचार्य, आचार्य सें सौ गुना श्रेष्ठ पिता और से हजार गुना श्रेष्ठ माता गौरव से युक्त होती है।
इस श्रेष्ठता का कारण मनु लिखते है-
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम्‌ ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तु वष्शतैरपि ॥
अर्थात्‌ प्राणियों की उत्पति में माता-पिता को जो क्लेश सहन करना पड़ता है,उस क्लेश से वे (प्राणी) सौ वर्ष में भी निस्तार नही पा सकते । इसलिए मनु ने माता-पिता और गुरू इन तीन को सदा सेवा

से प्रसन्न रखने के निर्देश दिए हैं। यह व्यवस्था जीवन के सत्य और लक्ष्य को पाने के लिए भी आवश्यक है-
प्राणियों की भक्ति से इस लोक का, पिता में भक्ति से मध्य लोक का और गुरू में भक्ति से ब्रह्म लोक का सुख प्राप्त होता है। जिन पर इन तीनों की कृपा होती है, उनको सभी धर्मों का सम्मान मिलता है

और जिन पर माता-पिता तथा गुरू की कृपा  नही होती, उन्हें किसी धर्म के पालन सें सम्मान नही मिलता। उनके सभी कर्म निष्फल होते है। अतः जब तक माता-पिता और गुरू जीवित रहे, तब तक

उनकी सेवा ही करें और किसी अनुष्ठान की आवश्यकता नही है। यही कर्तव्य है, यही साक्षात्‌ धर्म है ।
माता-पिता की महता का उल्लेख शिवपुराण में यूं मिलता है-
पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च करोति च। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्‌॥
     अपहाय गृहे यो वै पितरोतीर्थमाव्रजेत्‌। तस्य पापं तथा प्रोफं हनने च तयोर्यथा॥
     पुत्रस्य च महतीर्थ पित्रोश्चरणपंकजम्‌। अन्यतीर्थ तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः॥
     इदं संन्निहितं तीर्थ सुलभं धर्मसाधनम्‌। पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थ गेहे सुशोभनम्‌॥

अर्थात्‌ जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है। जो माता-पिता को घर पर छोड़कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता-पिता की हत्या

से मिलने वाले पाप का भागी होता है, क्योकि पुत्र के लिए माता-पिता के चरण-सरोज ही महान तीर्थ है। अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते है, परंतु धर्म का साधन भूत यह तीर्थ तो पास मे ही सुलभ

है। पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही वर्तमान है।
   शास्त्रो की इस प्रकार की आज्ञा पालन करने वाले पुत्र के रूप में श्रवण कुमार अमर है। भगवान्‌ श्रीराम माता और पिता की आज्ञा मानकर ही एक आदर्श पुत्र के रूप में चौदह वर्ष तक वनवास में रहे।

अतः शास्त्र और महापुरूषो के चस्त्रि से प्ररेणा लेकर संतान को सदैव माता-पिता की सेवा को ही सबसे उंचा स्थान देना चाहिए ।

 
व्रत-उपवास
इस के लेख़क हैं Vandna Makkar   

पुराणों मे इस बात का विस्तार से उल्लेख मिलता है कि हमारे ऋषि-मुनि उपवास के द्वारा ही शरीर, मन एवं आत्मा की शुद्धि करते हुए आलौकिक शक्ति प्राप्त करते थे । वेद मे कहा गया है -
व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्‌ ।
दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥
       अर्थात्‌ मनुष्य को उन्नत जीवन की योग्यता व्रत से प्राप्त होती है, जिसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा से दक्षिणा यानी जो कुछ किया जा रहा है, उसमें सफलता मिलती है । इससे श्रद्धा जागती है और श्रद्धा

से सत्य की यानी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होती है, जो उसका अंतिम निष्कर्ष है ।
     आचरण की शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना, निष्ठापूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है । वस्तुतः विशेष संकल्प के साथ लक्ष्य सिद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य के नाम व्रत है ।
    असंयमित जीवन जीने के कारण जो अशुद्धियां और अनियमितताएं आ जाती है, उनके निवारण का सफल उपाय व्रताचरण ही होता है। अन्न की मादकता के कारण शरीर में आलस्य आने लगता है,

जिससे पूजा-उपासना से उत्पन्न आध्यात्मिक शक्ति नष्ट होने लगती है । व्रत से हमारा शरीर और मन शुद्ध बनता है।, आत्मविश्वास बढता है और सयंम की वृति का भी विकास होता है । आत्मविश्वास

हमारी शक्तियों को बढाता है। सयंम से शक्तियों का व्यय घटता है । इस प्रकार से आत्मशोधन और शक्ति दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। 
   इंद्रियो, विषय-वासना और मन पर काबू पानें के लिए उपवास एक अचूक साधन माना गया है। गीता में कहा गया है - विष्या विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
   चिकित्सकों  के मत में भी व्रत और उपवास रखने से अनेक शारीरिक-मानसिक बीमारियों मे लाभ मिलता है। सप्ताह में एक दिन का व्रत करने से हमारे आंतरिक अंगो को विश्राम करने और सफाई

करने का मौका मिलता ह।, जिससे शारीरिक-मानसिक शक्ति तथा आयु बढती है । इसके अलावा व्रतानुष्ठान द्वारा आधिभौतिक, आध्यात्मिक एवं आधिदैविक त्रिविध कल्याण प्राप्त होता है। 
    उपवास का प्रयोजन शरीर का नही, अपितु लक्ष्य पाने का संकल्प जगाना है । महात्मा बुद्ध ने अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए संकल्प किया कि इस आसन पर बैठे-बैठे मेरा शरीर भले ही सूख जाए,

चमड़ी, हड़ी और मांस भले ही विनष्ट हो जाए, किंतु दुर्लभ बोधि को प्राप्त किए बिना यह शरीर इस आसन से विचलित नही होगा । इस दृढ़ संकल्प से ही बुद्धत्व को प्राप्त हुए ।

 
मौन व्रत
इस के लेख़क हैं Savita Girdhar   

आध्यात्मिक उन्नति के लिए वाणी का शुद्ध होना परमावश्यक है । मौन से वाणी नियंत्रित एवं शुद्ध होती है । इसीलिए हमारे शास्त्रों में मौन का विधान बनाया गया है । श्रावण मास की समाप्ति के बाद भावप्रद प्रतिपदा से १६ दिनों तक इस व्रत के अनुष्ठान का विधान है । ऐसी मान्यता है कि मौन से सब कामनाएं पूर्ण होती हे । ऐसा साधक शिवलोक को प्राप्त होता है । मौन के साथ श्रेष्ठ चिंतन्‌, ईश्वर स्मरण आवश्यक है । शास्त्रकार ने मौन के साथ की गणना पांच तपों मे की है -

मनः प्रसादः सौभ्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशद्धिरित्येततपो मानसमुच्यते ॥
अर्थात्‌ मन की प्रसन्नता, सौभ्य-स्वभाव, मौन, मनोनिग्रह और शुद्ध विचार ये मन के तप है।
   इनमे मौन का स्थान मध्य में है । मन के परिष्कार तथा संयम के लिए मन की प्रसन्नता धारण की जाए, सौभ्यता धारण की जाए तत्पश्यात्‌ मौन का प्रयोग किया जाए । इसके प्रयोग से शुद्ध विचार उत्पन्न होते हैं ।  मन का परिष्कार होकर चंचलता और व्यर्थ चिंतन से मुक्ति होती है ।
चाणक्य नीति दर्पण मे कहा गया है : जो मनुष्य प्रतिदिन पूरे संवत मौन रहकर भोजन करता है, वह दस हजार कोटि वर्ष तक स्वर्ग में पूजा जाता है।
मौन की महिमा अपार है। मौन से क्रोध का दमन, वाणी का नियंत्रण,शरीर बल एवं आत्मबल में वृद्धि, मन को शांति तथा मस्तिष्क को विश्राम मिलता है, जिससे आंतरिक शक्तियों का विकास होता है और ऊर्जा का क्षरण रूकता है। इसलिए मौन व्रत को व्रत की संज्ञा दी गई है।
मौन के संबंध में महाभारत में एक कथा है। जब महाभारत का अंतिम श्लोक महर्षि वेदव्यास द्वारा बोला गया और गणेश जी द्वारा भोज पत्र पर लिखा जा चुका, तब महर्षि वेदव्यास ने कहा -÷विनेश्वर धन्य है आपकी लेखनी ! महाभारत का सृजन तो वस्तुतः परमात्मा ने किया है, पर एक वस्तु आपकी लेखनी से अधिक विस्मयकारी है- वह है आपका मौन। इस अवधि में मैंने तो १५-२० लाख शब्द बोल डाले, परंतु आपके मुख मे मैंने एक शब्द नहीं सुना।' इस पर गणेश जी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा-÷बादरनारायण, किसी दीपक में अधिक तेल होता है और किसी में कम, तेल का अक्षय भंडार किसी दीपक में नहीं होता। उसी प्रकार देव, मानव और दानव आदि जितने भी तनधारी जीव हैं, सबकी प्राण शक्ति सीमित है, उसका पूर्णतम लाभ वही पा सकता है, जो संयम से इसका उपयोग करता है। संयम का प्रथम सोपान है- वाक्‌ संयम। जो वाणी का संयम नहीं रखता, उसके अनावश्यक शब्द प्राणशक्ति को सोख डालते हैं। वाक्‌संयम से यह समस्त अनर्थपरंपरा दग्धबीज हो जाते है। इसीलिए मैं मौन का उपासक हूं।

 
बुरी नजर
इस के लेख़क हैं Savita Girdhar   
 संसार के लगभग सभी देशो मे बुरी नजर लगाने के प्रभाव को जाना जाता है। जीवित प्राणियो पर ही नही वरन्‌ निर्जीव पदार्थ पर बुरी नजर लगाने पर विकारग्रस्त हो जाते है। सुन्दर वस्तुएं खो जाती है, नष्ट हो जाती है। यहां तक कि सुन्दर प्रतिमा बुरी नजर के प्रभाव से खंडित होती देखी गई है। बिना किसी पूर्व रोग के एकाएक बच्चा बीमार पड़ जाता है। दुधारू पशु-गाय, भैंस आदि को जब बुरी नजर लग जाती है, तो उसका दूध सूख जाता है।
  बुरी नजर लगाने का आशय यह हैं कि जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुर्भावना या आकर्षण से एकाग्र होकर किसी व्यक्ति या वस्तु को देखता है, तो उसकी बेधक दृष्टि उस वस्तु पर दुष्प्रभाव डालती है। भूखे व्यक्ति की कुदृष्टि आपके भोजन को विषैला बना सकती है। अतः भोजन जहां तक हो सके, अजनबियों के बीच न करें।
  आमतौर पर बुरी नजर का प्रभाव कोमल चित वाले, बच्चो, महिलाओं और पालतू जानवरो पर देखा जाता है। इसके अलावा मकान, उद्योग, व्यापार, वाहन, दुकान आदि पर भी बुरी नजर का असर होता है। बच्चो पर बुरी नजर का प्रभाव शैशवावस्था मे अधिक होता है बुरी नजर के प्रभाव से अच्छा भला बच्चा देखते देखते ही बीमार पड़ जाता है। वह दूध पीना छोड़कर अधिक रोता है, चिड़चिड़ा हो जाता है, ज्वर आ जाता है। उसकी आखे चढ़ी हुई सी रहती है। पलको की बरोनियां खड़ी तथा मुहं से खटटी गंध आने लनती है। अपच की शिकायत हो जाती है।
  महिलाओं पर बुरी नजर का प्रभाव विवाह के समय, गर्भावस्था में बच्चा होने के बाद के समय में बच्चा होने के बाद के समय में अकसर होता है। वयस्क व्यक्ति को जब बुरी लगती है, तो उसे मानसिक तनाव, बेचैनी अशांति का अनुभव, शरीर की पीड़ा, ज्वर, मंदाग्नि आदि तकलीफें महसूस होती है ।
     बुरी नजर लगने के मूल मे वैज्ञानिकों ने मानवीय विद्युत्‌ का अहितकर प्रभाव माना है। किसी-किसी व्यक्ति की दूष्ति दृष्टि इतनी बेधक होती है कि उससे बच्चे की शक्ति खिंचती है और वे उसके झटके को बर्दाश्त न करके बीमार हो जाते है । ऐसा देखा गया है कि अजगर अपनी दृष्टि से आकाश से पक्षियों को अपनी ओर खींच लेता है । भेड़िए की दृष्टि से भेड़ और बिल्ली की दृष्टि से कबूतर इतने अशक्त हो जाते है कि भाग तक नही सकते । इसी को आंखो कीे आकर्षण शक्ति का सम्मोहन कहते है ।
    नजर से बचने के लिए काले टीके का या काले धागे के प्रयोग के पीछे मान्यता यह है कि यह विद्युत का सुचालक होता है । आमतौर पर देखने मे आया है कि आकाश की बिजली अकसर काले आदमी, जानवर, सांप या अन्य काली वस्तुओं पर पड़ती है। जाड़े के दिनो मे काले कपड़े अधिक गर्मी सोखते है। इसीलिए बच्चो को कपाल, हाथ-पैरो मे ओर आंखो में काजल लगाया जाता है ।  पैर, हाथ, गले, कमरे में काला ड़ोरा बांधा जाता है । काली बकरी का दूध पिलाया जाना और काली भस्म चटाना जैसे सभी कार्यों का उदेश्य नजर के दुष्प्रभाव से बचाने की शक्ति ग्रहण करना है । बुरी नजर से बचने के लिए शेर का नाखून, नीलकंठ का पर, मूंज या तांबे का ताबीज गले मे पहना जाता है । दुकानदार नींबू और हरी मिर्चें दुकान मे लटका कर रखते है । ट्रक मालिक ट्रक के पीछे जूता लटकाते है । कारखाने वाले प्रवेश द्वार पर घोडे+ की नाल लगाते है । मकान पर काली हड़िया टांगी जाती है । यह नजर की एकाग्रता भंग करने की दृष्टि से किया जाता है। 
 
स्वस्थ जीवन और प्राणायाम
इस के लेख़क हैं Salony Nagpal   

प्राण अर्थात्‌ जीवनशक्ति और उसका आयाम अर्थात्‌ विस्तार, नियमन मिलकर प्राणायाम शब्द की रचना हुई है। प्राणायाम अष्टांगयोग का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसका शाब्दिक अर्थ है - प्राण का व्यायाम । महर्षि पतंजलि के मतानुसार - तस्मिन्‌ सति श्वास-प्रश्वासयोगतिर्विच्छेदः प्राणायामः अर्थात्‌ श्वासप्रश्वास की गति का विच्छेद करके प्राणवायु को सीने में भरने, भीतर रोककर रखने और उसे बाहर छोड़ने का नियमन करने के कार्य को प्राणायाम कहते है ।

जैसे अग्नि से तपाये हुए स्वर्ण, रजत आदि धातुओ के मल दूर हरे जाते है, वैसे ही प्राणायाम के अनुष्ठान से इंद्रियो मे आ गए दोष, विकार आदि नष्ट हो जाते है और केवल इन्द्रियों के ही नही, बल्कि देह, प्राण, मन के विकार भी नष्ट हो जाते हैं तथा ये सब साधक के वश में हो जाते है ।
योग दर्शन के अनुसार- ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्‌-
  प्राणायाम के अभ्यास से विवेक (ज्ञान) रूपी प्रकाश पर पड़ा अज्ञान रूपी आवरण (पर्दा) हट जाता है । योगचूडामणि मे कहा गया है कि प्राणायाम मे पाप जल जाते हैं । यह संसार समुद्र को पार करने के लिए महासेतुरूप है ।
 यो तो प्राणायाम का मुरव्य उदेश्य अध्यात्मिक साधना का मार्ग प्रशस्त करना है, फिर भी शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण से भी इसका काफी महत्व माना गया है। इससे शरीर को अतिरिक्त आंतरिक सामर्थ्य, बल एवं उर्जा प्राप्त होती है तथा मानसिक शांति मिलती है । मानसिक रोगो से मुक्ति प्राप्त होकर स्मरण शक्ति बढ़ती है । श्वास-प्रश्वास के नियमन से  फेफडे मजबूत होते है, जिससे रक्त शुद्ध होता है और शरीर निरोगी बनकर दीर्घायु प्राप्त होती है । प्राणायाम से जठराग्नि प्रदीप्त होती है, मन की चंचलता पर नियंत्रण होता है, इंद्रियो के विकारो से निवृति होती है, चेहरे की क्रांति बढती है, मोटापा दूर होता है, और भूख-प्यास पर निंयत्रण होता है । इसके उंचे अभ्यास से आयु को बढ़ाना संभव है और इच्छामृत्यु को प्राप्त किया जा सकता है ।
वैज्ञानिक दृष्टि से प्राणायाम से शरीर के विभिन्न हिस्सों और अंगो पर दबाब पड़ता है, जिसके कारण उस क्षेत्र का रक्त संचार बढ जाता है । परिणामस्वरूप उन अंगो की स्वस्थता बढती है । प्राणायाम मे ली गई गहरी सांस से मस्तिष्क से सारा दूषित खून बह जाता है और हदय का शुद्ध रक्त उसे अधिक मात्रा मे मिलता है । योग मे उड्ड़ियान बंध के प्रयोग से इतना अधिक शुद्ध रक्त
उसे अधिक मात्रा में मिलता है । जितना किसी श्वास संबंधी व्यायाम से नही । अतः प्राणायाम स्वास्थय के लिए अत्यंत आवश्यक है । इससे शरीर शुद्धि के अलावा मनोबल बढता है । इसीलिए हमारे महर्षियों ने संध्यावंदन के साथ नित्य प्राणायाम का नियम बनाया है ।

 
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